Ati Aatma Sadhana satra

Br.Arunkumar ki Myanmaar Prachaar Yatra


ब्रह्मचारी अरुणकुमार ”आर्यवीर“ ने म्यांमार (बर्मा) देश में 18 मार्च से 18 अप्रैल 2011 तक सफल प्रचार...

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            वेद एवं वैदिक साहित्य में छिपे प्रबन्धन तकनीक को जो भारत में आयातीत विदेशी तकनीक से कहीं श्रेष्ठ है को उजागर करना सांतसा का मुख्य उद्देश्य है।
            सांतसा विषयों पर लेखन कार्य डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय द्वारा यद्यपि 35 वर्षोंपूर्व ही किया जा चुका है किन्तु इन विषयों का जनसामान्य के लिए प्रकाशन लगभग 13 वर्षों पूर्व हो चुका था। 1996 में सांतसा त्रैमासिक का प्रकाशन आरम्भ ब्रह्मचारी अरुणकुमार “आर्यवीर” ने किया। तब से इन विषयों पर कई पुस्तकों में एवं सांतसा के अंकों में पर्याप्त सामग्री समय-समय पर प्रकाशित की जा चुकी है। 2001 में सांतसा न्यास का पंजीकरण भी मुम्बई में कराया गया है। तभी से www.santasa.com नामक वेबसाईट बनाई गई जो फेब्रुवारी 2009 से www.santasa.org नाम परिवर्तित की गई है। इस विषय पर लिखे गए आलेखों पर परिचर्चा संगोष्ठियां कार्यशालाओं आदि का आयोजन प्रमुखता से भिलाई छत्तीसगढ़ एवं देश के अन्य विभिन्न प्रान्तों में भी कराया जाता आ रहा है।
             इक्कीसवीं सदी की सुखद भविष्य को साकार करनेवाली विधा का नाम है ‘सांतसा’। सांतसा वह विधा है जिसमें तकनीकी प्रगति की धारा को सांस्कृतिकता तथा सामाजिकता द्वारा (सांत) सीमित किया जाता है। एक तिहाई सांस्कृतिकता, एक तिहाई औद्योगिकता एवं एक तिहाई सामाजिकता है जिस तकनीक में वह सांतसा तकनीक है। वेद-दर्शन-उपनिषद आधारित भारतीय संस्कृति में छिपे तकनीकी एवं प्रबंधन तत्वों को जो विश्व को सुख, समृद्धि एवं शान्ति दिला सकता है का अन्वेषण, प्रकाशन इस साईट की प्रमुख विशेषताएं हैं।

प्रजातंत्र हत्या क्रान्ति

वर्तमान शासन प्रणाली का आधार प्रजातन्त्र है। जिसकी प्रचलित परिभाषा है- प्रजा का प्रजा के लिए प्रजा के द्वारा किया गया शासन। आजादी के बाद के आज तक के लम्बे इतिहास ने इस तथ्य को झुठला दिया है। 66 प्रतिशत भूखे, 60 प्रतिशत अशिक्षित तथा करीब 52 प्रतिशत बेघर लोगों का यह देश प्रजातन्त्र को प्रजतन्त्र से विस्थापित करने की मांग करता है। प्रजातन्त्र के सारे मुख्य संस्थापक चिन्तक घटिया जीवन जीने वाले थे।
आज प्रजातन्त्र में प्रजाननों का बोलबाला है। येन केन प्रकारेण प्रजा के मतों से जीता लाखों गधासिरों से बना है सिर जिसका और इन गधा सिरों पर एक महाधूर्त सियार सिर सिरमौर है जिसका ऐसा दषानन से कहीं घातक, कहीं पातक एम.एल.ए., एम.पी., उपमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री नामधारी व्यक्ति प्रजानन है। संक्षेप में प्रजा का आनन समाविष्ट है जिसमें वह एक आनन है प्रजानन। एक दशानन घातक था। इतने प्रजानन कितने घातक हैं? आइए थोडा विचार करें।
प्रजातन्त्र बीज ही विकृत हैं। इनसे अलगाव, घृणा, गालियां भ्रष्टाचार, आतंकवाद, प्रजाननवाद, अयोग्यता, क्षमताह्रास, मात्र के वृक्ष या फसलें उगती हैं। औसत व्यवस्था है प्रजातन्त्र, औसत से ऊपर उठने पर रोक है प्रजातन्त्र। औसत से श्रेष्ठ का अस्वीकार है प्रजातन्त्र। श्रेष्ठता भावना की भ्रूण हत्या है प्रजातन्त्र। इसमें ईसा, ब्रूनो, सुकरात, स्पिनोजा, दयानन्द आदि तो दूर; सूर, तुलसी, मीरादि भी पैदा नहीं हो सकते। प्रजा आगे का सच नहीं सोच सकती। प्रजातन्त्र भी भविष्यान्ध है। सुकरात को जहर, ब्रूनो को आग, एनेक्सगोरस को मृत्युदण्ड, गैलीलियो को जेल, दयानन्द को जहर, स्पिनोजा को एक लाठी भीड़ से दूर रहने का दण्ड आदि प्रजा ने ही दिया है। इसका पूरा इतिहास घोर काला है।
प्रजातन्त्र का जवाब हैं प्रजतन्त्र। प्रजतन्त्र ही स्वतन्त्र, स्वाधीन, स्वस्थ, स्वस्ति शब्दों को सार्थक कर सकता है। इसका आधार प्रजानन के स्थान पर ”स्वानन“ है । प्रजा में अपना चेहरा घोर विकृत प्रत्यय है। स्व में अपना चेहरा सटीक सही प्रत्यय है। ”जो तुम हो वही है दूसरा“ यही प्रजतन्त्र है। ”आत्मा की उपमा से हर व्यवहार“ है प्रजतन्त्र। ”समस्त प्राणियों को आत्मवत जानना तथा उनसे आत्मवत व्यवहार तथा उनका उल्लंघन मात्रानुसार अपराध एवं दण्डनीय” यह प्रजतन्त्र का   संविधान तथा कानून है। सरल एवं सहज कानून जो हर प्रज जानता है। यही प्रतिजन-तन्त्र है। प्रतिजन = प्रज = स्व = आदमी।
    प्रति-जन-तन्त्र व्यवस्था है योग्यता व्यवस्था। एक स्कूल व्यवस्था के समान जहां शिक्षा ही योग्यता का आधार है। तथा डेढ़ हजार विधार्थियों को योग्यतानुसार क्रमबद्ध किया जा सकता है। ग्यारहवीं का सर्वोच्च अंक प्राप्त व्यक्ति प्रथम उच्च श्रेणी पर तथा पहली का न्यूनतम अंक प्राप्त व्यक्ति सबसे निम्न सीढी पर रहता है।
    उपरोक्त शिक्षांक योजना एवं अनुभवांक योजना के सम्मिश्र रूप के क्रमों पर हर सामाजिक को बांट देना ही प्रतिजनतन्त्र है या प्रजतन्त्र है।